जो नदी कभी सिर्फ बहती थी
हंसती थी खेलती थी ,
घाट घाट पर ,
हर एक मोड़ पर ,
मस्ती में आगे बढती थी .
आज वो कुछ कहती है ,
कहीं चिल्ला के तो कहीं ख़ामोशी से ,
काश कोई इस आवाज को समझे ,
कोई इस कर्कश परवाज को समझे .
नहीं समझे तो समझ जाओगे ,
जब रात के सन्नाटे में ,
वो नदी कहर बरपाएगी ,
और गाएगी हमारे बर्बादी के गीत .
जो सुर कभी कल कल लगती थी
वो सुर काल बन कर कहर ढायेगी
सभी पर …जो उसके दुःख के भागी है
नदियों ने किसी को नहीं छेड़ा है
उसके अपने रास्ते हैं …
भलाई इसी में है हम सब सिर्फ ,
अपने रास्ते पर ही चले तो बेहतर होगा ,
नदियाँ हैं उनको आज़ाद कर दो .
अभी तो सब सिर्फ शो रील देख रहे हो ,
पूरी फिल्म आनी अभी बाकी है मेरे दोस्त ,
ये नदियाँ हैं …
इन्हें इनके धुन में रहने दो
नहीं तो इनके ताल पर नाचोगे …
जैसे अभी कुछ लोग नाच रहे हैं ,
अगर तुम्हे भी नाचना है तो
घुँगरू पहन लो …!!!
जो नदी कभी सिर्फ बहती थी
हंसती थी खेलती थी ,
घाट घाट पर ,
हर एक मोड़ पर ,
मस्ती में आगे बढती थी .
आज वो कुछ कहती है ,
कहीं चिल्ला के तो कहीं ख़ामोशी से ,
काश कोई इस आवाज को समझे ,
कोई इस कर्कश परवाज को समझे …!!!
हंसती थी खेलती थी ,
घाट घाट पर ,
हर एक मोड़ पर ,
मस्ती में आगे बढती थी .
आज वो कुछ कहती है ,
कहीं चिल्ला के तो कहीं ख़ामोशी से ,
काश कोई इस आवाज को समझे ,
कोई इस कर्कश परवाज को समझे .
नहीं समझे तो समझ जाओगे ,
जब रात के सन्नाटे में ,
वो नदी कहर बरपाएगी ,
और गाएगी हमारे बर्बादी के गीत .
जो सुर कभी कल कल लगती थी
वो सुर काल बन कर कहर ढायेगी
सभी पर …जो उसके दुःख के भागी है
नदियों ने किसी को नहीं छेड़ा है
उसके अपने रास्ते हैं …
भलाई इसी में है हम सब सिर्फ ,
अपने रास्ते पर ही चले तो बेहतर होगा ,
नदियाँ हैं उनको आज़ाद कर दो .
अभी तो सब सिर्फ शो रील देख रहे हो ,
पूरी फिल्म आनी अभी बाकी है मेरे दोस्त ,
ये नदियाँ हैं …
इन्हें इनके धुन में रहने दो
नहीं तो इनके ताल पर नाचोगे …
जैसे अभी कुछ लोग नाच रहे हैं ,
अगर तुम्हे भी नाचना है तो
घुँगरू पहन लो …!!!
जो नदी कभी सिर्फ बहती थी
हंसती थी खेलती थी ,
घाट घाट पर ,
हर एक मोड़ पर ,
मस्ती में आगे बढती थी .
आज वो कुछ कहती है ,
कहीं चिल्ला के तो कहीं ख़ामोशी से ,
काश कोई इस आवाज को समझे ,
कोई इस कर्कश परवाज को समझे …!!!

No comments:
Post a Comment